मैंने पूछा इस दिल से बोल तुझे क्या गम है,,,
वो बोला : धडक रहा हूँ तेरे लिये क्या ये गम ही कुछ कम है…
उसके प्यार मे हुम लुट गये कुछ इस कदर,
के आँसू भी न बचे गम भुलाने के लिये…
ऐ खुदा उसे लग जाये अब मेरि भी उमर,
हुम जी कर इन्तिज़ार क्या करे मौत आने के लिये…
याद आता है हुमको वो बचपन का ज़माना
वो सावन के मौसम में झुले लगाना ,
बरसात मे घर के आँगन में नहाना,
ठहरे पानी मे पैरो से लेहरें उठाना,
लेहरों पे छोटी छोटी कशती चलाना,
और साथ बारिश के मिट्टी की खुशबू का आना,
सुबह लेट होने पे बिन साबुन के नहाना,
लन्च ब्रेक मे पेन्डिन्ग होम वर्क निपटाना,
हर गलती पे एक चकाचक बहाना,
मास्टर के आते ही सन्नाटे का छाना,
और घर आते हि जुते और बसता बगाना,
याद आता है,,,,
नम्बर मिलने पर घर पे न बताना,
पापा के आने से पेहले सो जाना,
सुबाह मम्मी मसका लगाना,
और जाते जाते रिपोर्ट कार्ड साइन कराना,
याद आता है,,,,
एक पेहलू ममता का ये भी
मेरी हर गलती पे माँ के दिल की हालत कुछ ऐसी होई
पेहले मुझे खूब पीटा फिर मेरे साथ ही रोई
हर बार लगने से पेहले बाबा के हाथ से चोट
मुझे बचा लेती थी माँ के आन्चल की ओट
पुरी कर मेरी हर इच्छा बाबा के ताने सुनती रही
मै तो यू ही सोया सारी रात माँ मेरे लिये ख्वाब बुनती रही
मेरी पसन्द की सब्ज़ी आज फिर माँ ने बनाई है
मै खालूँ जी भर के इसिलिये बाकि सब को सिर्फ़ चखाई है
चेहरे से मेरे मन की हालत पेहचान लेती है
कितने नम्बर आये हैं बिना रिपोर्ट कार्ड के जान लेती है
रन्ग रोगन मे देरी दिवाली पे हर बार हुई
माँ ने अपने लिये कभी कुछ न मांगा मेरे लिये बाबा से तकरार हुई
पेहले मुझे खूब पीटा फिर मेरे साथ ही रोई
हर बार लगने से पेहले बाबा के हाथ से चोट
मुझे बचा लेती थी माँ के आन्चल की ओट
पुरी कर मेरी हर इच्छा बाबा के ताने सुनती रही
मै तो यू ही सोया सारी रात माँ मेरे लिये ख्वाब बुनती रही
मेरी पसन्द की सब्ज़ी आज फिर माँ ने बनाई है
मै खालूँ जी भर के इसिलिये बाकि सब को सिर्फ़ चखाई है
चेहरे से मेरे मन की हालत पेहचान लेती है
कितने नम्बर आये हैं बिना रिपोर्ट कार्ड के जान लेती है
रन्ग रोगन मे देरी दिवाली पे हर बार हुई
माँ ने अपने लिये कभी कुछ न मांगा मेरे लिये बाबा से तकरार हुई
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