मेरी हर गलती पे माँ के दिल की हालत कुछ ऐसी होई
पेहले मुझे खूब पीटा फिर मेरे साथ ही रोई
हर बार लगने से पेहले बाबा के हाथ से चोट
मुझे बचा लेती थी माँ के आन्चल की ओट
पुरी कर मेरी हर इच्छा बाबा के ताने सुनती रही
मै तो यू ही सोया सारी रात माँ मेरे लिये ख्वाब बुनती रही
मेरी पसन्द की सब्ज़ी आज फिर माँ ने बनाई है
मै खालूँ जी भर के इसिलिये बाकि सब को सिर्फ़ चखाई है
चेहरे से मेरे मन की हालत पेहचान लेती है
कितने नम्बर आये हैं बिना रिपोर्ट कार्ड के जान लेती है
रन्ग रोगन मे देरी दिवाली पे हर बार हुई
माँ ने अपने लिये कभी कुछ न मांगा मेरे लिये बाबा से तकरार हुई
बाबा के पसन्द की चीज़ें उस दिन ज़रुर बनाई जाती है
जिस दिन किसी के द्वारा मेरी शिकायत लगाई जाती है
ज़रुरत पडने पर बाबा की चाय मे पानी ज़्यादा कर देती है
पर नाशते मे मेरे दूध का गिलास पूरा भर देती है
धुँधली होती आन्खों मे उसके अपने सपने तक खोये हैं
पर मेरे टुटे खिलोने भी माँ ने आज तक सन्जोये हैं
इम्तिहान मेरा हो तो नींद माँ की उड जाती है
और उसकी हर दुआ मेरी मेहनत मे जुड जाती है
मै मन मे समझता रहा खुद को खूब सयाना
पर जान बुझ कर सच माना माँ ने मेरा हर बहाना
सुबह लेट होने पर माँ गुस्सा तो हो जाती है
पर शोर को बाबा के कानों तक पहुचने से बचाती है
हर सुबह मेरे स्कूल के जूते मा को ही पाते हैं
और उसे पता है मेरे पेट के चूहे कब कितना खाना खाते हैं
धूप आँधी बरसात से माँ खुद को नही बचाती है
पर मुझे सर से पाव तक अपने आन्चल मे छुपाती है…

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